जो नीद जगती रही,
एक हकीकत जो नींद जगाती रही,
कहीं वो न आ जाय, कसक यहीं सताती रहीं॥
कभी करवट बदलें ,कभी सांसों को रोकें,
कभी जम्बाई भरे,कभी पलकें उठायं,
यही सिलसिला चलता रहा, और वो शमां जलती रही॥
कहीं वो न आ जाय, कसक यहीं सताती रहीं॥
कितना मुश्किल है, मुश्किल का वो समय,
कैसे कटता है,वो पीड़ायुक्त सी राह,
अपने भी परे हो जाते हैं, पराये का नाज उठती रही॥
कहीं वो न आ जाय , कसक यहीं सताती रही॥
द्वारा-भजन सिंह घारू
विचारों का अंतर्द्वंद ..... सुंदर रचना
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