पहाड़ों का सीना चीर दे,
आओं कलम उठाओ, पहाड़ों का सीना चीर दे।
जग मै अमन का छिडकाव करे,न रहे कोई पीड़ दे।।
हर पहाड़ मे अम्बर दफ़न है, कौन इसका मत्था फोड़ेगा।
एक बार चलन जो चल पड़ा,विधुत की तरह फिर दोरेगा।
न छोटा देखें ,न बड़ा छोड़े हर जगह को चीर दे।।
उत्तम विचार व् उअत्तं वस्तुएँ जग के काज सावारेगी।
होगा थोडा निक्कम्मा भी, वो भी राग मिलाएगी।
तत्थों की परख जरुरी है , हर तत्थ को छान लें।।
आओं कलम उठाओं , पहाड़ों का सीना चीर दे॥
जग मे अमन का छिडकाव करे, न रहे कोई पीड़ दे॥
द्वारा-भजन सिंह घारू
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