Sunday, February 26, 2023

बैंको का राष्ट्रीयकरण

 

बैंको का राष्ट्रीयकरण क्या होता है?

राष्ट्रीयकरण का एक अर्थ होता है सरकारीकरण । जब किसी संस्था या व्यापारिक इकाई का स्वामित्व सरकार के अधीन होता है तो उसे राष्ट्रीयकृत संस्था/इकाई कहा जाता है । सरकार का स्वामित्व तब ही माना जाता है जब उसकी पूंजी का न्यूनतम 51% हिस्सा सरकार के पास हो ।

आजादी के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि छोटे व्यापारी, लघु व कुटीर उद्योग तथा कृषि क्षेत्र, जिनकी देश की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका है, को आवश्यक ऋण सविधाएं उपलब्ध कराने मे देश के बड़े बैंकों की कोई रूचि नहीं है । अधिकांश बैंक अपने आकाओं का हित साधने में लगे है । ग्रामीण व अर्द्ध शहरी क्षैत्र में बैंक की शाखाओं का अकाल है ।

उस समय एक जुमला प्रसिद्ध था कि भारतीय बैंकिंग व्यवस्था “क्लास बैंकिंग” (Class Banking) है, यानि आम आदमी बैंक शाखा मेंं प्रवेश करने की कल्पना नहीं कर सकता । इसी “क्लास बैंकिंग” को “मास बैंकिंग” (Mass Banking) में बदलने के लिये तात्कालिक प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इन्दिरा गांधी ने निजी बैंकोंं के राष्ट्रीयकरण का साहसिक व ऐतिहासिक कदम उठाया ।

राष्ट्रीयकरण के पहले दौर में 19 जुलाई, 1969 को 14 बड़े बैंकों को सरकारी स्वमित्व में ले लिया गया । तत्पशचात 1980 में 6 और बडे़ बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया ।

इससे पूर्व इम्पीरियल बैंक आफ इण्डिया का पूर्ण स्वामित्व भारतीय स्टेट बैंक के रूप में, 1955 में सरकार ने अपने हाथ में ले लिया था । 1960 में अलग अलग राज्यों में कार्यरत 8 बड़े बैंकों को भारतीय स्टेट बैंक के सहायक बैंकों का दर्जा देते हुवे इनके नियंत्रण का जिम्मा भारतीय स्टेट बैंक को प्रदान किया गया ।

देश के सुदूर इलाकों में बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध करवाने व महाजनी कर्ज जाल में पीढिय़ों से झकड़े किसान व भूमिहीन मजदूर को अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में लाने में राष्ट्रीयकृत बैंकों के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा ।

 

     

 

 

 

भारत में बैंकों का राष्ट्रीयकरण

 

भारतीय बैंकिंग प्रणाली में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना भारतवर्ष के कृषकों एवं पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन में क्रांतिकारी घटना मानी जा सकती है क्योंकि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना के पीछे मूल उद्देश्य यही है कि छोटे तथा मझोले स्तर के किसानों, भूमिहीन मजदूरों आदि को आसानी से बैंकिंग सेवाओं एवं सुविधाओं का लाभ पहुंचाया जाए तथा उन्हें युग-युग से चले आ रहे साहूकारों की जंजीरों से मुक्ति दिलाकर उनके अपने गौरब को पुनरूज्जीवित करनें की सहायता प्रदान की जाए। इन बैंकों की स्थापना क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के अध्यादेश १९७५ अंतर्गत किए जाने का निर्धारण किया गया और स्थानीय जरूर दृष्टिगत रखकर सभी अनुसूचित बैंकों को इस प्रकार की क्षेत्रीय ग्रामीण बैंको की स्थापना के लिए अनुदेश जारी किए गए हैं। इन अनुदेशों के अनुसार सभी वाणिज्यिक बैंकों ने क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की है और निरंतर ये बैंक स्थापित किए जा रहे हैं और इस प्रकार की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की गई है कि इनका विकास ऐसे क्षेत्रों में विशेष रूप से किया जाएगा जहां पर वाणिज्यिक बैंकों तथा सहकारी बैंकों की सेवाओं एवं सुविधाओं का विकास नहीं हो सका है। इस प्रकार क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा उनके लक्ष्य की पूर्ति करने की दिशा में निरंतर प्रयास जारी है और इनकी सेवाओ तथा सुविधाओं का लाभ उचित जरूरतमंद व्यक्तियों तक पहुंच रहा है, यही क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के लोकप्रिय होने की पावती मानी जा सकती है।

भारतीय बैंकिग प्रणाली में वाणिज्यिक बैंकों की अपनी अलग पहचान होने के सात ही उनका महत्व विशेष माना जा सकता है। बैंकिंग प्रणाली की 'रीढ़' की हड्डी इसको कहा जा सकता है। ये बैंक अपने पूर्ण अंश पत्रों के विक्रय, जनता से प्राप्त जमा सुरक्षित कोष, अन्य बैंकों तथा केन्द्रीय बैंक से ऋण लेकर प्राप्त करते हैं और सरकारी प्रतिभूतियों, विनिमय पत्रों, बाड़ों, तैयार माल अथवा अन्य प्रकार की तरल या चल सम्पत्ति की जमानत पर ऋण प्रदान करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक का इन पर नियंत्रण रहता है। राष्ट्रीयकरण से पूर्व इनका उद्देश्य तथा बैंकिग प्रणाली थोड़ी भिन्न प्रकार की थी किन्तु प्रमुख बैंकों के राष्ट्रीयकरण के साथ ही इनकी कार्य प्रणाली तथा अंतर्गत परिचालन की दशा एव दिशा में आमूलाग्र परिवर्तन हुए हैं। इस परिवर्तन के पीछे बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मूल उद्देश्य निहित है। अत: भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के प्रमुख वाणिज्यिक बैंको के राष्ट्रीयकरण की घटना युगप्रवर्तक मानी जा सकती है। बैंक राष्ट्रीयकरण के साथ ही भारतवर्ष की सामाजिक तथा आर्थिक विकास की दिशा उन्नत करने वाले एक नए पर्व की शुरूआत हुई है। १९ जुलाई १९६९ को देश के ५० करोड़ रुपये से अधिक जमा राशि वाले प्रमुख चौदह अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण के साथ ही इस नए विकास पर्व का श्रीगणेश हुआ। इसी के साथ ही भारतीय बैंकिंग प्रणाली मात्र लेन-देन, जमा या ऋण के माध्यम से केवल लाभ अर्जित करने वाला उद्योग ही न रहकर भारतीय समाज के गरीब, दलित तबकों के सामाजिक एवं आर्थिक पुनरुत्थान और आर्थिक रूप में उन्हें ऊंचा उठाने का एक सशक्त माध्यम बन गया। बैंक राष्ट्रीयकरण की सूत्रधार सौदामिनी श्रीमती इंदिरा गांधी को पूरा यकीन था कि यह बैंकिंग उद्योग राष्ट्र के सर्वागीण विकास एवं पुनरुत्थान की दिशा में तेजी लायेगा। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के ऐतिहासिक पर्व की शुरूआत करते समय श्रीमती इंदिराजी ने कहा था कि "बैंकिंग प्रणाली जैसी संस्था, जो हजारों -लाखों लोगों तक पहुंचती है और जिसे लाखों लोगों तक पहुंचाना चाहिए, के पीछे आवश्यक रूप से कोई बड़ा सामाजिक उद्देश्य होना चाहिए जिससे वह प्रेरित हो और इन क्षेत्रों को चाहिए कि वह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं तथा उद्देश्यों को पूरा करने में अपना योगदान दें। " इस विश्वास को सार्थक करने की प्रक्रिया में ही २०० करोड़ रुपये से अधिक जमा राशि वाले और छ: बैंकों का राष्ट्रीयकरण १५ अप्रैल १९८० को कर दिया गया।

बैंक राष्ट्रीयकरण के उदेश्य

राष्ट्रीयकरण से पूर्व सभी वाणिज्यिक बैंकों की अपनी अलग और स्वतंत्र नीतियां होती थीं और उनका उद्देश्य अधिकाधिक लाभ के मार्गों को प्रशस्त करने तक ही सीमित था जो स्वाभाविक ही माना जाना चाहिए क्योंकि इन बैंकों के अधिकतर शेयर-धारक कुछ इने-गिने पूंजीपति व्यक्ति थे जो अपने हितों की रक्षा के साथ निजी हिताधिकारियों को ही बैंकिंग सेवाओं एवं सुविधाओं का लाभ पहुंचाते थे। समाज के गरीब, कमजोर वर्ग, दलित तथा सामान्य ग्रामीण तबकों के लोगों को बैंक किस चिडिया का नाम होता है, इसका भी पता नहीं था। अत: वे दिन-प्रतिदिन सेठ-साहूकारों एवं महाजनों के सूद के नीचे इतने दब गए कि जीवन की असली पहचान तक भूल गए। भारतवर्ष असलियत में ग्रामों में ही बसा है और ग्रामों में किसान एवं खेतीहर मजदूर बसते हैं। बैंक राष्ट्रीयकरण के पूर्व किसानों की हालत इतनी खराब होती थी कि उनके बारे में एक कड़वा सत्य कहा जाता है कि भारतीय किसान कर्ज में ही जन्म लेता है। कर्ज में ही पलता है और पीछे कर्ज छोड़कर ही मरता है। फलत: ऐसी दशा में पूंजीपति अधिक धनवान होते गए तथा निर्धन और भी गरीबी के दो पाटों में पिसते गए और देश में भयंकर सामाजिक असंतुलन का संकट पैदा हो गया। सामाजिक असंतुलन के साथ ही राष्ट्र जबर्दस्त आर्थिक विषमताओं के कोढ़ में उलझ गया। इस प्रकार सामाजिक तथा आर्थिक विकास की गति अवरुद्ध होती गई जिसके फलस्वरूप क्रांतिकारी नई आर्थिक नीति की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी अत: देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की ह़अडी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके उन्हें देश के विकास प्रवाह में शामिल किया जाना एक राष्ट्रीय आवश्यक्ता थी। फलत: बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इस राष्ट्रीयकरण में मूल उद्देश्य यही रहा कि बैंकिंग प्रणाली देश के आर्थिक विकास मूलक कार्यों में सक्रिय सहयोग प्रदान करके बैंकिंग सेवाओं एवं सुविधाओं का लाभ समाज के कमजोर वर्गों सहित अन्य सभी क्षेत्रों को पहुंचाने में अहम भूमिका अदा करें।

इस प्रकार प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने के मूल उद्देश्य थे।

(अ) बैंकिंग सुविधाओं तथा सेवाओं का विस्तार करना, राष्ट्रीयकरण के पहले बैंकिग सेवाए कुछ पूजीपतियों एवं बड़े व्यापारी तथा किसानों तक ही सीमित थीं जिसके फलस्वरूप समाज के दो वर्गों में बहुत बड़ी आर्थिक दरार उत्पन्न हो गई थी। इस आर्थिक विषमता को दूर करने हेतु बैंकिग सेवाओं एवं सुविधाओं का लाभ समाज में सभी वर्गों विशेषत: ग्रामीण कस्बाई क्षेत्रों में बसे कमजोर वर्गों तक पहुंचाने का मूल उद्देश्य बैंकों के राष्ट्रीयकरण में निहित है।

(आ) देश का आर्थिक विकास दूसरा उद्देश्य माना जा सकता है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि बैंक राष्ट्रीयकरण के पहले देश में आर्थिक संकट उत्पन्न होने के कारण आर्थिक विकास की गति अवरुद्ध हो गई थी। अत: देश के आर्थिक विकास में तेजी लाने के लिए बैंको का राष्ट्रीयकरण किया जाना बहुत ही आवश्यक हो गया था क्योंकि किसी भी देश की प्रगति एवं खुशहाली के लिए उसके आर्थिक विकास की ही महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

(इ) बैंक राष्ट्रीयकरण का तीसरा उद्देश्य था देश में बेरोजगारी की समस्या। यह भारतवर्ष की मुख्य चिंता रही है कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण के माध्यम से इस समस्या का समाधान खोजा जा सकता था क्योंकि शिक्षित बेरोजगारों को आर्थिक सहायता के माध्यम से उनके अपने निजी उद्योग या स्वरोजगार के अनेक साधनों में वृद्धि करके बेरोजगारी पर काबू पाया जा सकता था। जब तक देश में बेरोजगारी की समस्या का उचित हल नहीं होता तब तक उसके विकास कार्य में तेजी नहीं आ सकती। इस तथ्य को दृष्टिगत रखकर बेरोजगारी उन्मूलन की दिशा में ठोस कदम उठाए जाना जरूरी हो गया था ताकि बैंकिंग सेवाओं तथा सहायता का लाभ शिक्षित बेरोजगारों को मिलकर वे अपनी उन्नति के नए मार्ग प्रशस्त कर सकें।

(ई) बैंक राष्ट्रीयकरण का एक उद्देश्य यह भी था कि समाज के कम जोर वर्गों तथा प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों के लोगों का बैंकिंग सेवाओं एवं सुविधाओं के माध्यम से उत्थान करके देश की आर्थिक उन्नति को एक नई दिशा प्रदान कराना। देश के कमजोर वर्ग तथा प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों के लोग अर्थात् छोटे तथा मंझोले किसान, भूमिहीन मजदूर, शिक्षित बेरोजगार, छोटे कारीगर आदि की आर्थिक उन्नति में योगदान दिया जाना बहुत आवश्यक हो गया था क्योंकि ऐसे वर्गों के लोग देशभर में फैले हुए थे और उनकी संख्या काफी थी। समाज में वे अपेक्षित भी थे। अत: वर्गों के लोगों में नया आत्मविश्वास पैदा करके उन्हें उन्नति एवं खुशाहाली के मार्ग पर लाना देश की सर्वागीण प्रगति के लिए बहुत जरुरी हो गया था। अत: बैंकिंग सुविधा के माध्यम से ही इनका विकास संभव था। फलत: बैंक राष्ट्रीयकरण का विचार सामने आया।

(उ) बैंकों के राष्ट्रीयकरण का एक और मूल उद्देश्य था ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति में सुधार तथा कृषि एवं लघु उद्योगों के क्षेत्रों की समुचित प्रगति किया जाना। भारतीय किसान युग-युग से उपेक्षित ही रहा और हर बार वह औरों से चुसता ही गया। फलत: वह गरीबी की पर्तों से ऊपर नहीं उठ सका था। यही हालत कुटीर उद्योग एवं लघु उद्योगों की थी। ये व्यवसाय अधिकतर कृषि पर ही निर्भर करते थे और कृषि और कृषि का क्षेत्र उपेक्षित तथा अविकसित होने के कारण इन उद्योगों का भी प्रगति नहीं हो पाई थी। इस प्रकार, कृषि एवं लघु उद्योग जैसे उपेक्षित क्षेत्रों की ओर उचित ध्यान देकर उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार लाया जाना राष्ट्र की प्रगति के लिए बहुत आवश्यक तथा अनिवार्य हो गया था।

(ऊ) देश के बीमार उद्योगों को पुनरूज्जीवित करके नए लघु-स्तरीय उद्योगों के नव निर्माण को बढ़ावा देना भी बैंकों के राष्ट्रीयकरण का एक उद्देश्य था। बीमार उद्योगों के कारण बेरोजगारी की समस्या में वृद्धि होकर आर्थिक मंदी फैलने का यह भी एक कारण था अत: ऐसे उद्योगों को आर्थिक सहायता देकर पुनरूज्जीवित करना आवश्यक था। इसके साथ ही लघु-स्तरीय उद्योगों की संख्या पर्याप्त नहीं थी जिससे कस्बाई क्षेत्रों की प्रगति में तेजी नहीं आ पा रही थी और ऐसे उद्यमी हमेशा विदेश की ओर आंखें लगाकर बैठे हुए होते थे। अत: देश की प्रगति के लिए लघु-स्तरीय उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना भी अत्यंत जरूरी था जोकि आर्थिक सहायता के बगैर असंभव-सा प्रतीत होता था। अत: बैंकों द्वारा आर्थिक नियोजन के लिए उनपर सरकार का स्वामित्य होना एक आवश्यक बात हो गई थी। इस प्रकार अनेक सामाजिक तथा आर्थिक उद्देश्यों के कारण बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया जिससे कि कमजोर एवं उपेक्षित वर्गों की उन्नति के साथ समाज की और प्रकारांतर से राष्ट्र की प्रगति हो।

बैंक राष्ट्रीयकरण के बाद

राष्ट्रीयकरण के बाद उनकी शाखाओं के विस्तार के साथ ही उनके द्वारा किए गए विकास कार्यों में आश्चर्यकारक प्रगति हुई है। ये सभी राष्ट्रीयकृत बैंक देश के सामाजिक तथा आर्थिक विकास कार्यों की समुचित प्रगति हेतु कटिबद्ध हैं तथा सरकार की नीति के अनुसार कमजोर वर्ग एवं पिछड़ी जाति-जनजाति के लोगों को आर्थिक सहायता द्वारा उसके निम्न स्तर के ऊपर उनके राष्ट्रीय कार्य में सरकार की पूरी तौर पर सहायता कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की ओर बैंकों ने विशेष ध्यान दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों की क्रय शक्ति में वृद्धि करने के लिए बैंकों ने इन क्षेत्रों में अधिक से अधिक पूंजी नियोजन किया है। ग्रामीण तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की स्थापना से तो ग्रामीण विकास तथा उन्नति की अनेक नई दिशाएं उन्नत हुई हैं। समाज के लगभग सभी वर्गों के लोगों तक बैंकिंग सेवा तथा सुविधाएं पहुंच गई हैं और उनका लाभ सभी को समान रूप से मिल रहा है। स्वरोजगार की नई योजना चलाए जाने के कारण शिक्षित बेरोजगारी की समस्या का हल क्रमश: होता जा रहा है। कुटीर उद्योग तथा लघु स्तरीय उद्योगों में काफी बढ़ोतरी हुई है और साथ में निर्यात -आयात को भी बढ़ावा मिल रहा है। श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा सूत्रपात किए गए नए बीस सूत्री आर्थिक कार्यक्रम ने तो देश की सामाजिक तथा आर्थिक प्रगति का एक नया अध्याय खोल दिया है। बीस सूत्री आर्थिक कार्यक्रम ने छोटे किसान, भूमिहीन खेतीहर मजदूर, शिक्षित बेरोजगार, आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग, अनुसूचित जाति व जनजाति, शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति, छोटे कारीगर जैसे अनेक कमजोर वर्गों के लोगों के जीवन में विकास तथा खुशहाली का नया सूत्रपात किया। इस प्रकार बैंकों के राष्ट्रीयकरण से देश की आर्थिक व सामाजिक प्रगति का एक नया पर्व शुरू हुआ है।

भारत में बैंकिंग

भारत में आधुनिक बैंकिंग सेवाओं का इतिहास दो सौ वर्ष पुराना है।

भारत के आधुनिक बैंकिंग की शुरुआत ब्रिटिश राज में हुई। 19वीं शताब्दी के आरंभ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 3 बैंकों की शुरुआत की - बैंक ऑफ बंगाल ( Bank of Bangal )1806 मेंबैंक ऑफ बॉम्बे (Bank of Bombay ) 1840 में और बैंक ऑफ मद्रास ( Bank Of Madras ) 1843 में। लेकिन बाद में इन तीनों बैंको का विलय एक नये बैंक 'इंपीरियल बैंक' ( Bank of Imperial )में कर दिया गया जिसे सन 1955 में 'भारतीय स्टेट बैंक' ( State Bank of India ) में विलय कर दिया गया। इलाहाबाद बैंक ( Elahabad Bank) भारत का पहला निजी बैंक था। भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India ) सन 1935  में स्थापित किया गया था और बाद में पंजाब नेशनल बैंक,( Punjab National Bank )   बैंक ऑफ़ इंडिया, (Bank Of India), केनरा बैंक ( Canara Bank )और इंडियन बैंक( Indian Bank ) स्थापित हुए। भारत में प्रारम्भ में बैंकों की शाखायें और उनका कारोबार वाणिज्यिक केन्द्रों तक ही सीमित होती थी। बैंक अपनी सेवायें केवल वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों को ही उपलब्ध कराते थे। स्वतन्त्रता से पूर्व देश के केन्द्रीय बैंक के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक ही सक्रिय था। जबकि सबसे प्रमुख बैंक इम्पीरियल बैंक ऑफ इण्डिया था। उस समय भारत में तीन तरह के बैंक कार्यरत थे - भारतीय अनुसूचित बैंक, गैर अनुसूचित बैंक और विदेशी अनुसूचित बैंक।

स्वतन्त्रता के उपरान्त भारतीय रिजर्व बैंक को केन्द्रीय बैंक का दर्जा बरकरार रखा गया। उसे 'बैंकों का बैंक' भी घोषित किया गया। सभी प्रकार की मौद्रिक नीतियों को तय करने और उसे अन्य बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं द्वारा लागू कराने का दायित्व भी उसे सौंपा गया। इस कार्य में भारतीय रिजर्व बैंक की नियंत्रण तथा नियमन शक्तियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

अनुक्रम

·         1बैंकों का राष्ट्रीयकरण

·         2निजी व सहकारी क्षेत्र के बैंक

·         3भारत में बैंकिग क्षेत्र में आधुनिक सुधार

·         4वर्तमान भारत में बैंकिंग

o    4.1विभिन्न प्रकार के वाणिज्यिक बैंक

 

बैंकों का राष्ट्रीयकरण

मुख्य लेख: भारत में बैंकों का राष्ट्रीयकरण

भारतीय रिजर्व बैंक का राष्ट्रीयकरण स्वतन्त्रता के उपरान्त सन् 1949 में किया गया। इसके कुछ वर्षों के उपरान्त सन् 1955 ई. में इंम्पीरियल बैंक ऑफ इण्डिया का भी राष्ट्रीयकरण किया गया और उसका नाम बदल करके भारतीय स्टेट बैंक रखा गया। आगे चलकर सन् 1959 ई. में भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम बनाकर आठ क्षेत्रीय बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। वर्तमान में ये आठों बैंक भारतीय स्टेट बैंक समूह के बैंक कहे जाते हैं। इन आठों बैंकों के नाम - स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ इन्दौर, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ ट्रावणकोर इत्यादि हैं। देशभर में इनकी लगभग 15,000 शाखायें हैं।

देश के प्रमुख चौदह बैंकों का राष्ट्रीयकरण 19 जुलाई सन् 1969 ई. को किया गया। ये सभी वाणिज्यिक बैंक थे। इसी तरह 15 अप्रैल सन 1980 को निजी क्षेत्र के छ: और बैंक राष्ट्रीयकृत किये गये। इन सभी बीस बैंकों की शाखायें देशभर में फैली हैं। वर्तमान में कुल १९ राष्ट्रीयकृत बैंक हैं।

निजी व सहकारी क्षेत्र के बैंक

भारतीय रिजर्व बैंक ने जनवरी, सन् 1993 ई. में तेरह नये घरेलू बैंकों को बैंकिंग गतिविधियां शुरू करने की अनुमति दी। इनमें प्रमुख हैं यू.टी.आई., इण्डस इण्डिया, आई.सी.आई.सी.आई., ग्लोबल ट्रस्ट, एचडीएफसी तथा आई.डी.बी.आई.। देश में लगभग पाँच सौ सहकारी क्षेत्र के बैंक भी बैंकिंग गतिविधियों में संलगहैं। देशी बैंकों के साथ अमेरिकी, यूरोपीय तथा एशियायी देशों की बैंकें भी भारत में अपनी शाखायें खोलकर कारोबार कर रही हैं। इनकी शाखायें महानगरों तथा प्रमुख शहरों तक ही सीमित हैं। देश में ग्रामीण बैंकों का बड़ा संजाल फैलाया गया है। देश में लघु बैंकिंग कारोबार में इन ग्रामीण बैंकों की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

भारत में बैंकिग क्षेत्र में आधुनिक सुधार

मुख्य लेख: नरसिंहम् समिति

भारत में बैंकिग क्षेत्र में समय-समय पर सुधार किए जाते रहे हैं। इसके लिए सरकार ने समय-समय पर कई समितियां बनाई जिनकी रिपोर्ट में उन 14 बड़े व्यापारिक बैंको को राष्ट्रीयकरण किया गया जिनके पास 60 करोड़ रुपये थे तथा 1980 में उन 6 बैंकों को राष्ट्रीयकरण किया गया जिनके पास 200 करोड़ रुपये थे। उसके बाद भारत में बैंकों का महत्व और बढ़ा तथा इन बैंकों की शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में भी खोली गई। सन् 1991 में इन बैंकों में सुधार की आवश्यकता महसूस की गई। इसके लिए भारत सरकार ने अगस्त 1991 में श्री एम. नरसिंहम की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की तथा बाद में सन् 1998 में भी बैंकिग प्रणाली सुधार कमेटी इन्हीं की अध्यक्षता में नियुक्त की गई। वित्तीय प्रणाली की समीक्षा के लिए एम. नरसिंहम ने 1991 में निम्नलिखित सिफारिशें की-

1. इस समिति ने तरलता अनुपात में कमी करने की सिफारिश की जिसमें कानूनी तरलता अनुपात (SLR) को अगले पांच वर्षों में 38.5 प्रतिशत से कम करके 28 प्रतिशत कर देने की सिफारिश की।

2. इस समिति ने निर्देशित ऋण कार्यक्रमों को समाप्त करने की सिफारिश की।

3. इस समिति के अनुसार ब्याज दरों का निर्धारण बाजार की शक्तियों के द्वारा होना चाहिए। ब्याज दरों के निर्धारण में रिजर्व बैंक का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

4. इस समिति ने बैकों की लेखा प्रणाली में भी सुधार करने की बात की।

5. इस समिति ने बैकों के ऋणों की समय पर वसूली के लिए विशेष ट्रिब्यूनल की स्थापना पर जोर दिया।

6. नरसिंहम समिति ने बैंकों के पुनर्निर्माण के ऊपर भी जोर दिया। इस समिति के अनुसार 3 या 4 अन्तर्राष्ट्रीय बैंक, 8 या 10 राष्ट्रीय बैंक तथा कुछ स्थानीय बैंक एवं कुछ ग्रामीण बैंक एक देश के अन्दर होने चाहिए।

7. इस समिति ने शाखा लाइसेंसिंग की समाप्ति की सिफारिश की।

8. नरसिंहम समिति ने विदेशी बैंकिग को भी अपने देश में प्रोत्साहित करने की सिफारिश की।

9. इस समिति ने बैंकों पर दोहरे नियंत्रण को समाप्त करने की सिफारिश की।

पहले बैंकों पर वित्त मंत्रालय तथा रिजर्व बैंक का नियंत्रण होता था। नरसिंहम कमेटी ने सुझाया कि बैंकों पर केवल रिजर्व बैंक का नियंत्रण होना चाहिए।


1998
में गठित नरसिंहम समिति की प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित हैः

1. सुदृढ़ वाणिज्यिक बैंकों आपस में विलय अधिकतम आर्थिक और वाणिज्यिक माहौल पैदा करेगा और इससे उद्योगों का विकास होगा।

2. सुदृढ़ वाणिज्यिक बैकों का विलय कमजोर वाणिज्यिक बैकों के साथ नहीं किया जाना चाहिए।

3. देश के बड़े बैंकों को अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया जाना चाहिए।

4. जोखिम भरी आस्तियों से पूंजी के अनुपात को सन् 2000 तक 9 प्रतिशत तथा सन् 2002 तक 10 प्रतिशत के स्तर पर लाया जाना चाहिए।

5. सरकारी प्रतिभूतियों द्वारा कवर किए गए असुविधाजनक हो चुके ऋणों को गैर निष्पादनीय अस्ति माना जाए।

6. रुपये 2,00,000 लाख से कम के ऋणों पर ब्याज नियंत्रण का अधिकार बैंकों को दिया जाए।

वर्तमान भारत में बैंकिंग

भारत में बैंकिंग बहुत सुविधाजनक और परेशानी मुक्त है। कोई भी (व्यक्ति, समूह या जो भी हो) आसानी से लेनदेन की प्रक्रिया कर सकता हैं जब भी किसी को आवश्यकता हो। बैंकों द्वारा भारत में दी जाने वाली आम सेवाएँ इस प्रकार हैं -

·         बैंक खाते: यह बैंकिंग क्षेत्र की सबसे आम सेवा है। कोई भी व्यक्ति बैंक खाता खोल सकता है जो कि बचतखाता, चालू खाता या जमा खाता कुछ भी हो सकता है।

·         ऋण खाते: आप विभिन्न प्रकार के ऋणों के लिए किसी भी बैंक का रुख कर सकते हैं। यह आवास ऋण, कार ऋण, व्यक्तिगत ऋण, शेयर के विरुद्ध ऋण और शैक्षिक ऋण या कोई भी ऋण हो सकता है।

·         धन हस्तांतरण: बैंकें विश्व के एक कोने से दूसरे कोने में पैसा स्थानांतरण करने के लिए ड्राफ्ट, धनाआदेश या चेक जारी कर सकते है।

·         क्रेडिट और डेबिट कार्ड: सभी बैंकें अपने ग्राहकों को क्रेडिट कार्ड की पेशकश करते हैं। जो कि उत्पादों और सेवाओं को खरीदने के लिये या पैसे उधार लेने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

·         लाकर्स : अधिकांश बैंकों के पास लाकर्स सुविधा उपलब्ध होती है जिसमें ग्राहक अपने महत्वपूर्ण दस्तावेज या क़ीमती गहने सुरक्षित रख सकता है।

अनिवासी भारतीयों के लिए बैंकिंग सेवा

अनिवासी भारतीयों या एनआरआई लगभग सभी भारतीय बैंकों में खाता खोल सकते हैं। अनिवासी भारतीय तीन प्रकार के खाते खोल सकते हैं:

·        अनिवासी खाता (साधारण) - NRO

·        अनिवासी (बाह्य) रुपया खाते - NRE

·        अनिवासी (विदेशी मुद्रा) खाता - FCNR

विभिन्न प्रकार के वाणिज्यिक बैंक

भारत की वाणिज्यिक बैंकिंग इन श्रेणियों में रख सकते हैं-

१. केंन्द्रीय बैंक - रिजर्व बैंक ओफ़ इंडिया भारत की केंन्द्रीय बैंक है जो कि भारत सरकार के अधीन है। इसे केन्द्रीय मंडल के द्वारा शासित किया जाता है, जिसे एक गवर्नर नियंत्रित करता है जिसे केन्द्र सरकार नियुक्त करती है। यह देश के भीतर की सभी बैंकों को संचालन के लिए दिशा निर्देश जारी करती है।

२. सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंक -

·        भारतीय स्टेट बैंक और उसके सहयोगी बैंकों को 'स्टेट बैंक समूह' कहा जाता है।

·        20 राष्ट्रीयकृत बैंक

·        क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक जो कि मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा प्रायोजित हैं।

३. निजी क्षेत्र के बैंक

·        पुरानी पीढ़ी के निजी बैंक

·        नई पीढ़ी के निजी बैंक

·        भारत में सक्रिय विदेशी बैंक

·        अनुसूचित सहकारी बैंक

·        गैर अनुसूचित बैंक

४. सहकारी क्षेत्र - सहकारी क्षेत्र की बैंकें ग्रामीण लोगों के लिए बहुत अधिक उपयोगी है। इस सहकारी बैंकिंग क्षेत्र को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित कर सकत हैं -

·        1. राज्य सहकारी बैंक

·        2. केन्द्रीय सहकारी बैंक

·        3. प्राथमिक कृषि ऋण सोसायटी

५. विकास बैंक / वित्तीय संस्थाएँ

·        आईएफसीआई

·        आईडीबीआई

·        आईसीआईसीआई

·        IIBI

·        SCICI लिमिटेड

·        नाबार्ड

·        निर्यात आयात बैंक ऑफ इंडिया

·        राष्ट्रीय आवास बैंक

·        भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक

·        पूर्वोत्तर विकास वित्त निगम

 

 

 

 

 

            19 जुलाई, 1969 को प्रधानमन्त्री इन्दिरा गाँधी ने इन 14 बैंकों के राष्ट्रीयकरण की घोषणा की:

(1) सेन्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया,

(2) बैंक ऑफ इण्डिया,

(3) पंजाब नेशनल बैंक,

(4) बैंक ऑफ बड़ौदा,

(5) यूनाइटेड कामर्शियल बैंक,

(6) केनरा बैंक,

(7) यूनाइटेड बैंक ऑफ इण्डिया,

(8) देना बैंक,

(9) यूनियन बैंक ऑफ इण्डिया,

(10) इलाहाबाद बैंक,

(11) सिन्डीकेट बैंक,

(12) इण्डियन ओवरसीज बैंक,

(13) इन्डियन बैंक तथा

(14) बैंक ऑफ महाराष्ट्र ।

19 जुलाई, 1969 को एक अध्यादेश के अन्तर्गत 50 करोड़ रु. से अधिक जमा राशि वाले 14 बैंकों का स्वामित्व सरकार ने अपने अधिकार में ले लिया । परन्तु बैंकों को राष्ट्रीयकरण के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट में एक रिट प्रस्तुत की गयी । 10 फरवरी, 1970 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में राष्ट्रीयकरण को दोषपूर्ण बताकर अवैध घोषित कर दिया ।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के परिपेक्ष में 14 फरवरी, 1970 को एक अध्यादेश जारी किया गया तथा 26 फरवरी 1970 को संसद में एक विधेयक प्रस्तुत कर उसे पारित कर दिया । 31 मार्च, 1970 को इस कानून पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो गये । राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद बैंकों के राष्ट्रीयकरण ने वैध कानून का रूप ले लिया ।

राष्ट्रीयकृत 14 बैंकों की चुकता पूँजी 28.5 करोड़ रुपया थी तथा बैंकों के अपने कोष 66 करोड़ रु. के थे । ये बैंक 6.64 करोड़ रुपया शुद्ध लाभ अर्जित करते थे ।

सरकार के अधिकार में इस समय निम्नानुसार बैंक हैं- 14 राष्ट्रीयकृत बैंक, 1 स्टेट बैंक, तथा 6 स्टेट बैंक के सहायक बैंक । स्मरण रहे, सभी भारतीय बैंक तथा विदेशी बैंकों का राष्ट्रीयकरण नहीं हुआ है । केवल 14 अनुसूचित वाणिज्य बैंकों का ही राष्ट्रीयकरण हुआ है ।

इन्दिरा गाँधी के शब्दों में बैंकों का राष्ट्रीयकरण- ”बैंकों के राष्ट्रीयकरण के द्वारा हम अपने उद्देश्यों की पूर्ति अब तेजी से कर सकेंगे और बैंकिंग विकास की त्रुटियों को दूर किया जा सकेगा । बैंक साख का उचित उपयोग सम्भव हो सकेगा । कृषि, लघु उद्योग तथा निर्यात व्यापार के लिये पर्याप्त साख की व्यवस्था की जा सकेगी ।

बैंकों पर कुछ लोगों का नियन्त्रण समाप्त सके प्रबन्ध व्यवस्था में व्यवसायिक कुशलता लायी जा सकेगी । उद्योग के क्षेत्र में आने वाले नये साहसियों को प्रोत्साहन मिलेगा । बैंक के कर्मचारियों के लिये प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा सकेगी । इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये सामाजिक नियन्त्रण की नीति अपर्याप्त थी अतः बैंकों का राष्ट्रीयकरण इन उद्देश्यों के लिये अनिवार्य था ।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पक्ष में तर्क (Arguments in Favour of Bank Nationalization):

राष्ट्रीयकरण के पक्ष में निम्न तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं:

(1) समाजवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिये बैंकों पर राष्ट्रीयकरण आवश्यक है ।

(2) केन्द्रीय तथा वाणिज्य बैंकों के बीच एकता के लिये वाणिज्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण आवश्यक था ।

(3) बैंक साख का उचित उपयोग सम्भव हो सकेगा तथा कृषि, लघु उद्योग तथा यातायात के क्षेत्र में पर्याप्त साख की व्यवस्था हो सकेगी ।

(4) बैंक के कर्मचारियों के लिए उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था हो सकेगी ।

(5) निजी स्वामित्व की अपेक्षा राष्ट्रीयकृत बैंक अधिक कार्यकुशल होते है ।

(6) बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों का संचालन सरकार के हाथ में रहेगा, जिससे बैंकों के फेल होने का भय नहीं रहेगा । जमाकर्ताओं के निक्षेप अब सुरक्षित रहेंगे ।

(7) बैंकों पर सरकारी स्वामित्व होने के कारण ये बैंक देश की आर्थिक नीतियों के अनुसार प्राथमिकता प्राप्त उद्योगों को वित्तीय सहायता दे सकेंगे ।

(8) पंचवर्षीय योजनाओं के सफल संचालन में सरकार को मदद मिलेगी । बैंक के उपलब्ध साधनों का उपयोग विकास कार्य में होगा ।

(9) बैंकों के राष्ट्रीयकरण से बैंक एकाधिकारी प्रवृत्ति से दूर होंगे । उद्योगपतियों का बैंकों पर नियन्त्रण समाप्त हो जायेगा ।

(10) अब बैंक के संचालक अवांछनीय कार्य नहीं कर सकेंगे जैसे सट्टेबाजी में पैसा लगाना, बैंक के धन से मुनाफाखोरी करना चोर बाजारी करना, बैंक ऋण से संग्रहित करना आदि ।

(11) अब बैंकों की शाखाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में भी खोली जा सकेगी ।

राष्ट्रीयकरण के पूर्व सम्पूर्ण बैंकिंग व्यवसाय पर 8 बैंकों का नियन्त्रण था । इस प्रकार दो तिहाई बैंकिंग व्यवस्था 8 बैंकों के पास केन्द्रित था । संक्षेप में, बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मूल उद्देश्य बैंकों में व्याप्त एकाधिकारी प्रवृत्तियों को समाप्त करना था ।

राष्ट्रीयकरण के विपक्ष में तर्क (Arguments against Bank Nationalization):

बैंकों के राष्ट्रीयकरण का देश में विरोध भी हुआ । आलोचकों का कहना है कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण आर्थिक विचारधारा से प्रभावित न होकर राजनैतिक विचारधारा से प्रभावित है । इसका प्रमाण यह है कि अभी-अभी बैंकों पर सामाजिक नियन्त्रण लगा था । इसके परिणाम आने के पूर्व ही बैंकों का राष्ट्रीयकरण एक चौकने वाली घटना है ।

(1) आलोचकों का कहना है कि भारत में अब तक किया गया राष्ट्रीयकरण असफल रहा है । बैंक भी अब राष्ट्रीयकृत व्यवसाय की श्रेणी में आ गये हैं । अन्य उद्योगों तथा व्यवसाय की तरह बैंकों के राष्ट्रीयकरण भी असफल होगा ।

(2) बैंकों के राष्ट्रीयकरण से देश के औद्योगिक तथा व्यापारिक क्षेत्रों को काफी नुकसान होगा ।

(3) बैंकों का राष्ट्रीयकरण कांग्रेस की आपसी फूट का परिणाम है । यह आर्थिक कारणों की अपेक्षा राजनीतिक कारणों से किया गया है ।

(4) राष्ट्रीयकरण के बाद गरीब लोगों को, कृषकों से तथा लघु उद्योगपतियों को इससे विशेष लाभ नहीं होगा । सरकारी कर्मचारी सारी व्यवस्था को खराब करके रख देंगे ।

(5) राष्ट्रीयकृत उद्योगों की प्रबन्ध व्यवस्था कुशल नहीं होगी ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रिवी पर्स की समाप्ती       भारत में राजभत्ता विकिपीडिया

राजभत्तानिजी कोशप्रिवी पर्स किसी संवैधानिक या लोकतांत्रिक राजतंत्र में राज्य के स्वायत्त शासक एवं राजपरिवार को मिलने वाले विशेष धनराशी को कहा जाता है।   भारतवर्ष में राजभत्ता देने की परियोजना की शुरुआत सन १९५०में लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना के बाद हुई थी। इंग्लैण्डजापान या अन्य यूरोपिय देशों(जहां केवल एक राजवंश या राजपरिवार होते हैं) के विपरीत भारत में(गणराज्य के शुरुआती वर्षों में) कुल ५६२राजवंश थे। ये भारत के उन पूर्व राज्यों के राजवंश थे जिन्होंने नव-स्वतंत्र भारत(अर्थात भारत अधीराज्यअंग्रेज़ी: Dominion of India) में अपनी रियासतों को संधि द्वारा भारतीय संघ में, पहले शामिल किया एवं बाद में, अपने राज्यों को भारत गणराज्य में संपूर्णतः विलीन कर आधूनिक भारत को स्थापित किया था। जिसके कारणवश उन्होंने अपना शासनाधिकार पूर्णतः भारत सरकार के हाथों सौंप दिया था। भारतीय संघ में सम्मिलित होने की संधि के शर्तों में रियासतों के तत्कालीन शासकों एवं उनके उत्तराधिकारियों को आजीवनजीवनयापन हेतु भारत सरकार द्वारा विशेष धनराशि एवं भत्ते (राजभत्ता) दिये जाने का प्रावधान था। इस विशेष वार्षिक धनराशि को राजभत्तानिजी कोश या प्रिवी पर्स कहा जाता था। इस व्यवस्था को ब्रिटेन में चल रहे राजभत्ते (प्रिवी पर्स) की व्यवस्था के आधार पर पारित किया गया था। इस "अलोकतांत्रिक" व्यवस्था को सन १९७१में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासनकाल के दैरान पूर्णतः स्थगित कर दिया गया।

ब्रिटिश भारत में रियासतें

 

·         सलामी रियासतें(सलामी राज्य)

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·         राजभत्ता,   विलय के उपकरण

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·         हैदराबाद रियासत,   जम्मू और कश्मीर रियासत, त्रावणकोर,   सिक्किम   ,रामपुर रियासत

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अभिकरण

 

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सूचियां

 

·         ब्रिटिशकालीन भारत के रियासतों की सूची

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सम्बंधित पृष्ठ

 

·         ब्रिटिश भारत में रियासतें,   भारत का राजनीतिक एकीकरण,

·          

·         देवासं

·          

 

अनुक्रम

·         1नामकरण

·         2इतिहास

·         3राजभत्ते का मूल्य

·         4भारत में राजभत्ते की समाप्ति

नामकरण

यूनाईटेड किंगडम में, एवं भारत में भी, अंग्रेज़ी में इसे प्रिवीपर्स(अंग्रेज़ी: Privy Purse) कहा जाता था जिसे हिन्दी में "शाही भत्ता", "विशेश भत्ता" या "राजभत्ता", के रूप में अवतरित किया जा सकता है। भारत गणराज्य में पूर्व राजवंशों को मिल रहे इस विशेष भत्ते को "राजभत्ता" या "प्रिवीपर्स" कहना पूर्णतः उचित नहीं होगा क्योंकि अन्य देशों के विपरीत भारत में यह प्रावधान सन्धि के आधार पर किया गया था। संवैधानिक तौर पर किसी भी भत्ता-प्राप्तकर्ता राजकीय या शाही दर्जा प्राप्त नहीं था। इस संदर्भ में इस विशेषाधिकार को "निजी कोश", "निजी भत्ता" या विशेश भत्ता कहना ज़्यादा समुचित होगा। 

इतिहास

ब्रिटिशकाल के समय भारत में ब्रिटिश-साशित क्षेत्र (ब्रिटिश भारत) के अलावा भी करीब ५६२ अन्य स्वतंत्र रियासतें थीं। यह रियासतें सन्धि द्वारा ब्रिटिश भारत की सरकार के अधीन थे। इन रियासतों की रक्षा व विदेश संबंधित मामलों पर ब्रिटिश सरकार आधिपत्य था, जिनका कुल क्षेत्रफ़ल भारतीय उपमहाद्वीप के क्षेत्रफ़ल की तिहाई के बराबर था, एवं इनके शासकों को क्षेत्रीय-स्वायत्तता प्राप्त थी। ब्रिटिश साम्राज्य में इनकी महत्ता व हैसियत सन्धियों के आधार पर तय की गई थी एवं बंदूकों/तोपों की सलामी की एक व्यवस्था रचित की गई थी जिस में बंदूकों की संख्या के क्रम के अनुसार राज्य की हैसियत का मूल्यांकन होता था। 1947 में यू॰के॰ की संसद में पारित भारतिय स्वतंत्रता अधिनियम के बिंदुओं के तहत ब्रिटेन ने भारत व पाकिस्तान आधिराज्यों को स्वतंत्र कर दिया एवं रियासतों पर अपनी आधिपत्यता का त्याग कर दिया। इन रियासतों को भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित होने या स्वतंत्र रहने का विकल्प दिया गया। सन 1947  तक अधिकतर राज्यों ने भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित होने के विकल्प को स्वीकार कर लिया और विलय के उपकरणों पर हस्ताक्षर कर दिया। कुछ रियासतों नें स्वतंत्र रहने का विकल्प चुना जिन में से त्रावणकोर, भोपाल और जोधपुर ने वार्ता एवं भारतीय कूटनीती के परिणामस्वरूप भारत में विलय को स्वीकार लिया। इस में भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल एवं वी॰पी॰ मेनन का प्राथमिक योगदान था। स्वतंत्रता के बाद भी कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ ऐसी रियासतें थीं जिन्हों ने विलय को स्वीकार नहीं किया। इन्हें बाद में सैन्य कार्रवाई द्वारा भारत में सम्मिलित किया गया। वलय के उपकरणों के आधार पर रियासतें केवल संचार-व्यवस्था, रक्षा और विदेश-मामले भारत सरकार को सौंपनें के लिये आधिपत्य थें। जिसके बाद भारत में रियासतों की व्यवस्था लगभग ब्रिटिशकाल की तरह ही थी। 1949 के बाद इन रियासतों को भारतिय संविधानिक शासन व्यवस्था में पूरी तरह विलीन कर दिया गया और इसी के साथ पूर्व शासकों को नाम मेत्र के शाही खिताबों को आधिकारिक दर्जा एवं सरकारी मान्यता दी गई साथ ही शासकों को विशेष भत्ता दिये जाने का भी प्रावधान किया गया। जबकी 1947 तक राजपरिवारों को पूर्व रियासत की राजकोशिय संपत्ती रखने दिया गया था परन्तु 1949  के बाद इसे भी ले लिया गया और पूर्व शासकों एवं उनके उत्तराधिकारियों को आजीवनजीवनयापन हेतु भारत सरकार द्वारा वार्षिक रूप से विशेष धनराशि एवं रियायतें दिये जाने के प्रावधान को शुरू किया गया। इस व्यवस्था को भी 1971  में 26वें संविधानिक संशोधन को संसद में पारित कर पूर्णतः स्थगित कर दिया गया।

राजभत्ते का मूल्य

राजभत्ते की धनराशि का मूल्यांकन कई तथ्यों के आधार पर होता था, जेसे की: राज्य का राजस्व, सलामी क्रम, रियासत की ऐतिहासिक सार्थकता, महत्ता, आदी। भत्ते की धनराशी आम तौर पर 5000  से ले कर लाखों रुपयों तक थी। 562  रियासतों में से102  रियासतें ऐसी थीं जिन्हें 1,00,000 से ज्यादा का वार्षिक भत्ता मिलता था। ६ रियासतों को  10,00,000  से ज़्यादा भत्ता मिलता था, यह राज्य थें हैदराबाद, मैसूर, त्रावणकोर, वडोदा, जयपुर और पटियाला। इसके अलावा कई छोटी जागीरों को रियासतों द्वारा कु नाम-मात्र की तुच्छ रियायतें मिलती थीं। कई रियासतों के लिये उत्तराधिकार पर भत्ते के मूल्य को घटा दिया जाता था, एवं सामान्य तैर पर भी भारत सरकार हर उत्तराधिकार पर रियायतों को घटा देती थी।